हालांकि समय के साथ यह रणनीति बदलती गई। 2023 के बाद भाजपा ने स्पष्ट रूप से गैर-जाट वोट बैंक को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाए और पिछड़ा वर्ग से लेकर ब्राह्मण और अब वैश्य समुदाय तक प्रतिनिधित्व का विस्तार किया।
पिछड़ा वर्ग से आते हैं सीएम
कुरुक्षेत्र के पूर्व सांसद व मौजूदा मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी पिछड़ा वर्ग से आते हैं। पार्टी ने 2023 में पहले उन्हें प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया। उसके बाद ब्राह्मण समुदाय से आने वाले मोहन लाल बड़ौली और अब डॉ. अर्चना गुप्ता को वैश्य समुदाय से प्रदेश अध्यक्ष बनाना, इस बात का संकेत है कि भाजपा जातीय राजनीति को एक स्थिर ढांचे की बजाय एक गतिशील रणनीति के रूप में इस्तेमाल कर रही है। यह बदलाव केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि चुनावी गणित से जुड़ा हुआ है, क्योंकि गैर-जाट समुदाय हरियाणा में भाजपा का मुख्य आधार माना जाता है।
वैश्य समुदाय का घट गया था प्रतिनिधित्व
वैश्य समुदाय की बात करें तो यह लगभग 7-8 प्रतिशत मतदाता हिस्सेदारी रखता है और शहरी सीटों पर इसका प्रभाव निर्णायक होता है। 2014 और 2019 में भाजपा ने इस समुदाय को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया था, लेकिन 2024 में टिकट वितरण और चुनाव परिणामों ने इस वर्ग के राजनीतिक प्रभाव को सीमित कर दिया। कई प्रमुख वैश्य नेता चुनाव हार गए, जिससे यह सवाल उठने लगा कि क्या पार्टी के भीतर इस समुदाय की पकड़ कमजोर हो रही है। ऐसे में डॉ. अर्चना गुप्ता की नियुक्ति को इस असंतुलन को फिर से संतुलित करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
संगठन में काम करने वालों को मौका
डा. अर्चना गुप्ता को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का निर्णय भाजपा की संगठन आधारित नेतृत्व नीति को भी दर्शाता है। पार्टी लगातार उन नेताओं को आगे बढ़ा रही है, जिन्होंने जमीनी स्तर पर संगठन के भीतर काम किया है। अर्चना गुप्ता का महिला जिला अध्यक्ष से प्रदेश अध्यक्ष तक का सफर इसी मॉडल का उदाहरण है। इससे पहले जो भी प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी में बैठे हैं, उनकी भी पृष्ठभूमि कुछ ऐसी रही है। इनमें नायब सिंह सैनी, मोहन लाल बड़ौली और ओमप्रकाश धनखड़ के मामलों में देखा गया था।
पहले रेखा गुप्ता और अब अर्चना गुप्ता, दिया बड़ा संदेश
दिल्ली में रेखा गुप्ता को मुख्यमंत्री और हरियाणा में डॉ. अर्चना गुप्ता को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर भाजपा ने स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है कि वह संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर महिलाओं को महत्वपूर्ण नेतृत्व भूमिकाएं दे रही है। यह कदम केवल प्रशासनिक या संगठनात्मक बदलाव नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पार्टी की सामाजिक और राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
भाजपा लंबे समय से महिला मतदाताओं को अपने कोर वोट बैंक के रूप में देखती रही है, खासकर जनकल्याणकारी योजनाओं और महिला-केंद्रित नीतियों के कारण। ऐसे में शीर्ष पदों पर महिलाओं की नियुक्ति से पार्टी न केवल महिला सशक्तिकरण का संदेश दे रही है, बल्कि आगामी चुनावों में इस वर्ग की भागीदारी और समर्थन को और मजबूत करने की रणनीति भी अपना रही है। यह निर्णय संगठन में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने और उन्हें निर्णायक नेतृत्व में लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।