(विवेक शुक्ला)
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सोमवार को जब ढाका की एक अदालत ने मौत की सजा सुनाई तब वो नई दिल्ली के अपने आवास में सुरक्षित बैठी थीं। उन्हें इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने जुलाई 2024 के छात्र आंदोलन के दौरान हुई हत्याओं का मास्टरमाइंड बताया। वहीं दूसरे आरोपी पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान को भी 12 लोगों की हत्या का दोषी माना और फांसी की सजा सुनाई। शेख हसीना नई दिल्ली के एक अज्ञात स्थान पर हैं। सुरक्षा कारणों से उनके आवास की जानकारी गुप्त रखी गई है। वो अपने देश में पिछले साल हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद आनन-फानन में नई दिल्ली आ गई थीं।
शेख हसीना ने बीते दिनों भारत के कुछ खास अखबारों को इंटरव्यू देते हुए अपने देश की सरकार की निंदा भी की थी। उन्हें भले ही सजा सुना दी गई है, पर शेख हसीना भारत की राजधानी नई दिल्ली में सुरक्षित हैं। फिलहाल तो उनके अपने देश में वापस जाने की कोई संभावना भी नहीं है।
देखा जाए तो दिल्ली उनके लिए दूसरे घर की तरह है, क्योंकि 1975 से 1981 तक छह साल उन्होंने यहीं निर्वासन में बिताए थे।
उन दिनों शेख हसीना नई दिल्ली पंडारा पार्क में रहती थीं। उनके पति डॉ. एम.ए. वाजेद मियां (परमाणु वैज्ञानिक) और दोनों बच्चे भी साथ थे। उनके पड़ोस में ही भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी भी रहा करते थे।
तब समय काटने के लिए शेख हसीना ने आकाशवाणी के बांग्ला सेवा में काम करना भी शुरू कर दिया था। वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन शर्मा याद करते हैं, “ शेख हसीना उस दौर में नियमित रूप से संसद मार्ग स्थित आकाशवाणी भवन में आया करती थीं।”दरअसल 15 अगस्त 1975 को ढाका के धानमंडी स्थित घर में उनके पिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान, मां और तीन भाइयों की हत्या कर दी गई थी। उस वक्त शेख हसीना अपने पति और बच्चों के साथ जर्मनी में थीं, इसलिए बच गईं। परिवार के नरसंहार से वे पूरी तरह टूट चुकी थीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें भारत में राजनीतिक शरण दी। इंदिरा और मुजीबुर रहमान के बीच गहरे व्यक्तिगत संबंध थे।
दिल्ली में उनके सबसे करीबी दोस्त प्रणब मुखर्जी और उनकी पत्नी शुभ्रा मुखर्जी थे। दोनों परिवार लगातार मिलते-जुलते थे। तालकटोरा रोड स्थित प्रणव मुखर्जी के घर हसीना अपने बच्चों के साथ अक्सर जाती थीं। दोनों परिवारों के बच्चे भी अच्छे दोस्त बन गए थे। प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने एक बार बताया था, “मम्मी और हसीना आंटी घंटों कला, संगीत और बांग्ला साहित्य पर बातें करती थीं। जब 18 अगस्त 2015 को मम्मी का निधन हुआ तो हसीना आंटी अपनी बेटी पुतुल के साथ श्रद्धांजलि देने आई थीं। पुतुल और मैं इंडिया गेट पर गुड़ियों से साथ खेलते थे।”
बांग्लादेश में हालात सुधरे तो शेख हसीना 1981 में स्वदेश लौट गईं, लेकिन मुखर्जी परिवार से रिश्ता कभी नहीं टूटा। दिल्ली आने पर वे जरूर शुभ्रा और प्रणब मुखर्जी से मिलती थीं। अवामी लीग के नेता लगातार दिल्ली आकर उनसे बांग्लादेश लौटने और सक्रिय राजनीति करने की गुजारिश करते थे। काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने 1981 में वापसी का फैसला किया। वो 2024 से दिल्ली में हैं, लेकिन अब न शुभ्रा मुखर्जी हैं, न पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी। दोनों इस दुनिया में नहीं रहे। यह मुमकिन है कि प्रणव कुमार मुखर्जी के परिवार के सदस्य उनसे मिलते-जुलते हों।
आज, जब वो फिर से नई दिल्ली में हैं, तो यह इतिहास का एक विडंबनापूर्ण दोहराव लगता है। 2024 का वह काला साल था जब बांग्लादेश की सड़कों पर छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा। उस आंदोलन ने जल्द ही पूरे देश को जकड़ लिया। सरकार ने सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत आरक्षण को बनाए रखने का फैसला किया था, जो स्वतंत्रता संग्राम के वीरों के परिजनों के लिए था। छात्रों ने इसे अन्यायपूर्ण बताते हुए विरोध शुरू किया। लेकिन हसीना सरकार ने इसका दमनकारी जवाब दिया। पुलिस और सशस्त्र बलों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की, जिसमें सैकड़ों की मौत हो गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 300 से अधिक लोग मारे गए, जबकि मानवाधिकार संगठनों का अनुमान 1,000 से ऊपर है। यह हिंसा हसीना के 15 वर्षों के शासन का अंतिम अध्याय साबित हुई।
अगस्त 2024 में, सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान ने हस्तक्षेप किया और हसीना को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। हसीना ने हेलीकॉप्टर से भागते हुए भारत का रुख किया। नई दिल्ली पहुंचकर उन्होंने कहा, “मैं हमेशा भारत की कृतज्ञ हूं।” भारत ने उन्हें शरण दी, लेकिन यह निर्णय विवादास्पद रहा। बांग्लादेश की नई अंतरिम सरकार, जिसका नेतृत्व नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस कर रहे हैं, ने हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की है। लेकिन भारत ने इसे अस्वीकार कर दिया, संप्रभुता और मानवीय आधार पर। हसीना के भारत में रहने से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया है।
आज की सजा उसी हिंसा का परिणाम है। ढाका की अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने हसीना को ‘जनसंहार’ और ‘मानवता के खिलाफ अपराधों’ का दोषी ठहराया।
खैर, शेख हसीना फिलहाल भारत में हैं।
बांग्लादेश सरकार ने उनके प्रत्यर्पण के लिए भारत से औपचारिक अनुरोध किया है, लेकिन भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि “यह मामला संवेदनशील है और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाएगा।” हसीना के वकील अब अपील की तैयारी कर रहे हैं, जो बांग्लादेश की सर्वोच्च अदालत में होगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, संयुक्त राष्ट्र और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की है।”
शेख हसीना शुरू से ही भारत ते करीब रहीं। इंदिरा गांधी ने शेख हसीना के पिता को मुजीब को ‘भाई’ कहा था, और हसीना को उनकी ‘बेटी’। यह बंधन आज भी कायम है। हसीना के शासनकाल में भारत-बांग्लादेश संबंध चरम पर पहुंचे। 2015 में भूमि सीमा समझौता, व्यापार वृद्धि और आतंकवाद विरोधी सहयोग प्रमुख उपलब्धियां थीं। लेकिन हसीना के भारत-समर्थक रुख ने उन्हें पाकिस्तान-समर्थित विपक्ष का निशाना बनाया।
क्या भारत उन्हें सौंपेगा? विशेषज्ञों का मानना है कि नहीं, क्योंकि यह भारत की शरण नीति का उल्लंघन होगा।

