नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने सोमवार को अपने एक घंटे लंबे आदेश में बताया कि वह दिल्ली शराब नीति मामले में सुनवाई से पीछे क्यों नहीं हटेंगी. बता दें कि मामला अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य को बरी किए जाने के खिलाफ सीबीआई की अपील की सुनवाई से जुड़ा है.
जस्टिस शर्मा ने कहा कि कोर्ट की एक अधिकारी के रूप में मैं यह बात जानती हूं कि झूठ चाहे अदालत में या सोशल मीडिया पर हजार बार दोहराया जाए, सच नहीं बन जाता, वह झूठ ही रहता है. झूठ को कई बार दोहराने से सच की ताकत कम नहीं हो जाती. उन्होंने अरविंद केजरीवाल द्वारा लगाए गए हर आरोप का जवाब दिया.
जस्टिस स्वर्ण कांता ने केस से खुद को अलग न करने के लिए दिए बताईं ये वजहें
1. वादी के भ्रम निष्पक्षता की धारणा को खारिज नहीं कर सकते
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने आदेश सुनाते समय कई बार इस बात पर जोर दिया कि अरविंद केजरीवाल ने अपनी दलीलों में कहा है कि वे उनकी निष्ठा पर सवाल नहीं उठा रहे हैं. जस्टिस को लेकर उनके मन में पूरा सम्मान है, लेकिन उनके मन में संदेह और आशंका है कि क्या उन्हें उनकी अदालत से न्याय मिलेगा या नहीं.
जस्टिस शर्मा ने कहा कि जज निष्पक्ष होता है.अरविंद केजरीवाल ने बहस के दौरान कई बार कहा है कि वे मेरी ईमानदारी पर शक नहीं कर रहे हैं, लेकिन उनके मन में कुछ शंकाएं हैं. केजरीवाल के मन में ऐसी भ्रांतियां होना, खुद को केस से अलग करने का आधार नहीं बन सकता. उनकी बर्खास्तगी की याचिका सबूतों के बजाय मेरी सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता और तटस्थता पर संदेह और आरोपों के साथ दायर की गई थी.
2.जज कई बार एसोसिएशन कार्यक्रमों में शामिल होते हैं
अरविंद केजरीवाल द्वारा लगाए गए आरएसएस से संबंध रखने वाले आरोपों पर जस्टिस शर्मा ने कहा कि वह अलग-अलग विचारधाराओं के बार एसोसिएशनों द्वारा आयोजित ऐसे कई कार्यक्रमों में शामिल होती रही हैं, क्योंकि जजों को ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होना पड़ता है. उन्होंने बताया कि ये कार्यक्रम नए आपराधिक कानूनों और महिला दिवस के आयोजनों पर आधारित थे, या फिर बार के युवा सदस्यों के साथ संवाद स्थापित करने के लिए आयोजित किए गए थे. पहले भी कई जज इस तरह के कर्यक्रमों में शामिल होते रहे हैं. इसे वैचारिक पूर्वाग्रह का संकेत देने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
उन्होंने कहा कि बार और न्यायपालिका के बीच का संबंध केवल अदालतों तक सीमित नहीं है. कोई भी इस संबंध में दखल नहीं दे सकता. यह न्यायिक संस्था का एक अनिवार्य हिस्सा है.
3. जज के बच्चों के पास वकालत करने का मौलिक अधिकार
अरविंद केजरीवाल द्वारा मामले की सुनवाई में “हितों के टकराव” के आरोपों पर उन्होंने कहा कि यह साबित करना होगा कि उनके फैसलं पर सरकारी पैनल में उनके परिवार के सदस्यों के साथ उनके संबंधों का प्रभाव पड़ेगा.जस्टिस शर्मा ने कहा कि वादी को यह दिखाना होगा कि इसका वर्तमान मामले या इस कोर्ट की निर्णय लेने की शक्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है. ऐसा कोई संबंध साबित नहीं हुआ है.उन्होंने आगे कहा कि जजों के बच्चों को वकालत करने से नहीं रोका जा सकता, क्योंकि यह उनके मौलिक अधिकारों का हनन होगा.उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी नेता की पत्नी नेता बन सकती है, अगर किसी नेता के बच्चे नेता बन सकते हैं, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि किसी जज के बच्चे वकालत के पेशे में नहीं आ सकते? इसका मतलब जजों के परिवार के मौलिक अधिकारों का हनन होगा.
4. केजरीवाल ने चुनिंदा आदेशों का इस्तेमाल करके कहानी गढ़ी
जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल और उनकी पार्टी के साथियों द्वारा दूसरे पक्ष की बात सुने बिना ही उनकी अदालत से राहत पाने के पिछले उदाहरणों का जिक्र किया. कोर्ट ने कहा कि जब उन्होंने पहली बार में उन्हें राहत दी थी, तब केजरीवाल ने कोई आरोप नहीं लगाया था. उन्होंने कहा कि केजरीवाल की पार्टी से जुड़े लोगों ने यह तर्क नहीं दिया कि उनके पक्ष में कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया जाना चाहिए. इस अदालत में केजरीवाल की पार्टी के नेताओं समेत कई अन्य मामले लंबित हैं. इस

