नई दिल्ली: पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने मोर पंख की बिक्री और इसके दुरुपयोग पर बड़ा बयान दिया है। प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन्होंने दावा किया है कि 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में बने वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत दिगंबर जैन साधुओं के आग्रह पर मोर पंख को बिक्री की परमिशन दी गई थी। उनका कहना है कि इसी छूट के बाद मोर पंख का बड़ा कारोबार खड़ा हो गया और अब अधिकांश पंख मोरों को मारकर हासिल किए जाते हैं।
गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी ने कहा कि दिगंबर जैन साधु अपनी कमर में मोर पंख से बनी ‘पिच्छी’ रखते हैं। उन्होंने बताया कि उस समय साधुओं ने सरकार से अनुरोध किया था कि मोर पंख पर प्रतिबंध न लगाया जाए, जिसे इंदिरा गांधी ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद मोर पंख भारत में कानूनी रूप से बेचे जाने वाले एकमात्र पक्षी के पंख बन गए।मेनका गांधी ने कहा कि यह गलत धारणा है कि मोर बड़ी संख्या में अपने पंख स्वाभाविक रूप से गिरा देते हैं। उनके मुताबिक, एक मोर सामान्य तौर पर महीने में केवल एक पंख ही गिराता है। लेकिन जैसी ही बिक्री की सरकार से परमिशन मिली, मोर पंख का एक बड़ा बाजार विकसित हो गया और लोग इन्हें घरों में सजावट के लिए इस्तेमाल करने लगे।मेनका गांधी ने दावा किया कि साल 2001 में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को इस संबंध में सबूत सौंपे थे। साथ ही मोर पंख की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून में संशोधन का सुझाव दिया था। उनके अनुसार, वाजपेयी इसके लिए तैयार हो गए थे और संशोधन का मसौदा संसद तक पहुंच गया था, लेकिन जैन समुदाय के दबाव के कारण उसे वापस लेना पड़ा।
हालांकि पूर्व केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट किया कि आरोप दिगंबर जैन समुदाय पर मोरों की हत्या करने का नहीं है। उन्होंने कहा कि उनका कहना केवल इतना है कि मोर पंख की बिक्री की अनुमति मिलने से एक ऐसा रास्ता खुल गया, जिसका बाद में बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हुआ है।
मेनका गांधी ने कहा, ‘किसी देश की महानता न केवल उसकी अर्थव्यवस्था से मापी जाती है, बल्कि इस बात से भी कि वह उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है जो अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकते। यही वे मूल्य हैं जिनसे आने वाली पीढ़ियां हमारा आकलन करेंगी।’

