पटना: तेजस्वी यादव आरोप लगा रहे हैं कि नीतीश कुमार से बांकीपुर चुनाव प्रचार का वीडियो जबर्दस्ती बनवाया गया है। तेजस्वी यादव को तो पता होगा कि नीतीश कुमार को किसी काम के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। जब खुद को शेर कहने वाले लालू यादव , नीतीश से जबरन अपनी बात नहीं मनवा सके तो किसी और के बारे में क्या कहा जा सकता है। तेजस्वी यादव को 2015 की बात जरूर याद होगी कि तमाम हथकंडे अपनाने के बाद भी लालू यादव, नीतीश कुमार से अपनी बात नहीं मनवा सके थे। उस समय तेजस्वी नये-नये राजनीति में आये ही थे। नीतीश कुमार के बुलंद इरादों को उन्होंने बहुत नजदीक से देखा था।
नीतीश कुमार फरवरी 2015 में जब जीतन राम मांझी के हटने के बाद फिर मुख्यमंत्री बने तो लालू यादव और नीतीश कुमार के गठबंधन की परिस्थितियां तैयार होने लगीं। लालू यादव नीतीश कुमार से गठबंधन तो करना चाहते थे लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं मानना चाहते थे। उन्होंने कह दिया कि चुनाव का रिजल्ट आने के बाद नेता का चुनाव होगा। लालू यादव ने तर्क दिया कि लंबे समय तक राजद और जदयू ने एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा है। दोनों दलों के समर्थक भी अभी तक एक दूसरे के खिलाफ रहे हैं। नीतीश कुमार कुर्मी हैं।
अगर, उन्हें अभी से नेता मान लिया जाएगा तो राजद के कोर वोटर यादव और मुस्लिम शायद खुले मन से नीतीश को वोट न करें। नीतीश लंबे समय तक भाजपा के साथ रहे हैं, इसलिए मुस्लिम वोटर भी उन्हें वोट देने में हिचक सकते हैं। इसलिए चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया जाना चाहिए।
नीतीश कुमार समझ गये थे लालू यादव की चाल
नीतीश कुमार लालू यादव के इस तर्क के पीछे की राजनीति समझ रहे थे। वे जानते थे कि यादव-मुस्लिम का तर्क सिर्फ उनके नेता बनने की राह में रोड़ा अटकाने के लिए है। लालू यादव चाहते थे चुनाव बिना सीएम फेस के हो ताकि बाद में वे नीतीश कुमार को अपनी मुट्ठी में रख सकें। वे चाहते थे कि रिजल्ट के बाद नीतीश को सीएम बना कर उन पर एहसान जताएं ताकि वे उनके इशारों पर चलने को मजबूर रहें। लालू यादव की इस चाल को भांप कर नीतीश ने चुनाव से पहले सीएम फेस घोषित करने की शर्त रख दी।
लालू यादव के रवैये को देख कर नीतीश कुमार ने गठबंधन के लिए रुचि दिखानी बंद कर दी। इस बीच मुलायम सिंह यादव ने लालू यादव से बात की। लेकिन लालू यादव, नीतीश को नेता मानने के लिए राजी नहीं थे।
कांग्रेस ने कहा- राजद से अलग होकर हमारे साथ आएं नीतीश
इस बीच एक बड़ी घटना हुई। अक्टूबर-नवम्बर 2015 में बिहार विधानसभा का चुनाव होना था। कांग्रेस भी अपने चुनावी भविष्य को लेकर योजना बना रही थी। जब कांग्रेस ने देखा कि बिहार में लालू यादव की नीतीश कुमार से बात नहीं बन रही है तो उसने नीतीश कुमार के पास गठबंधन का प्रस्ताव भेज दिया। राहुल गांधी ने प्रस्ताव दिया कि अगर नीतीश राजद से अलग हो जाएं तो कांग्रेस उनसे गठबंधन कर सकती है। राहुल गांधी ने नीतीश कुमार का वार्ता के लिए दिल्ली बुलाया। नीतीश और राहुल गांधी की बैठक हुई।
जैसे ही नीतीश कुमार की राहुल गांधी के साथ बैठक हुई, पूरे समाजवादी खेमे में हलचल मच गयी। अगर कांग्रेस का जदयू से चुनावी गठबंधन हो जाता तो पूरे देश में समाजवादियों के लिए खतरे की घंटी बज जाती। समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने तत्काल नीतीश कुमार और लालू यादव को अपने दिल्ली आवास पर बुलाया। सुलह कराने की कोशिश की। लेकिन लालू यादव नीतीश को सीएम पद का उम्मीदवार मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। बैठक फेल हो गयी। तब नीतीश ने कहा, उनका कांग्रेस से गठबंधन का फैसला बिल्कुल सही है। उस समय अगर मुलायम सिंह यादव ने दखल नहीं दिया होता तो 2015 में नीतीश कुमार कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़े होते। फिर तो देश और बिहार की राजनीति का परिदृश्य ही बदल गया होता।

