Russia : ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की शुरुआत कल (12 सितंबर) से होने जा रही है। इस बार सम्मेलन के लिए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से लेकर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, समेत 20 से ज्यादा देशों के राष्ट्राध्यक्ष और प्रतिनिधि भारत आ रहे हैं। इनमें कई देश ब्रिक्स के स्थायी सदस्य और कई देश ब्रिक्स के साझेदार के तौर पर शामिल हो रहे हैं। ब्रिक्स का लगातार बढ़ता यह दायरा इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि पहली बार जब इस संगठन के बारे में सोचा गया था, तब इसके लिए महज तीन देशों का विचार ही आया था। हालांकि, अगले कुछ वर्षों में इस गठबंधन की अवधारणा चार देशों से होते हुए आज असल स्वरूप में 20 देशों तक पहुंच चुकी है।
ब्रिक्स के इतिहास और अवधारणा को देखा जाए तो सामने आता है कि इसकी वैचारिक नींव 1996 से 1998 के बीच पड़ी थी। दरअसल, यह वह दौर था, जब सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस संभलने की कोशिश कर रहा था। वहीं, अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों के गठबंधन तेजी से उभर रहे थे। खासकर नाटो और जी7, जो कि रक्षा और आर्थिक संबंधों से जुड़े सबसे मजबूत गठबंधन माने जाते रहे।
2. भारत के सामने कब आया ब्रिक्स जैसे गठबंधन का विचार?
इन्हीं स्थितियों के बीच पहली बार रूस को एक ऐसे गठबंधन का ख्याल आया, जो कि पश्चिमी गठबंधनों से मुकाबले के लिए साथ खड़ा हो सकता है। रूसी सरकार का मकसद अमेरिका और पश्चिमी यूरोप पर रूस की जबरदस्त निर्भरता को खत्म करना और वैश्विक मामलों में सत्ता के केंद्रों में विविधता लाना था।बताया जाता है कि रूस के विदेश मंत्रालय ने पहली बार 1996 में इसकी अवधारणा सामने रखी थी। इसके बाद 1998 में ऐसे गठबंधन पर विचार करने और इसे असल स्वरूप देने के लिए रूस के विदेश मंत्री येवगेनी प्रिमाकोव ने जिम्मेदारी संभाली और 1998 में अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान सबसे पहले भारत के सामने ही ब्रिक्स जैसे गठबंधन का विचार सामने रखा। हालांकि, तब उनकी योजना में सिर्फ रूस, भारत और चीन ही थे। यानी प्रिमाकोव एक रणनीतिक यूरेशियाई त्रिकोण पर ज्यादा केंद्रित रहे।

