New Delhi : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने अंतरजातीय सामाजिक संबंधों और विवाह की वकालत की. उन्होंने महाराष्ट्र में हुए एक अंतरजातीय विवाह का जिक्र करते हुए कहा कि पहला अंतरजातीय विवाह 1942 में महाराष्ट्र में हुआ था. इस विवाह में दो प्रमुख हस्तियों ने आशीर्वाद संदेश भेजे थे- पहले बीआर आंबेडकर और एमएस गोलवलकर (आरएसएस के दूसरे प्रमुख) ने. उन्होंने कहा कि विवाह को व्यक्तिगत बंधन के बजाय एक सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए.
सामाजिक जीवन में समानता अपनाए
आरएसएस प्रमुख भागवत ने यह बातें कर्नाटक के मैसूरु (मैसूर) में गुरुवार को ‘राष्ट्रीय विकास की उत्प्रेरक के रूप में सामाजिक समरसता’ विषय पर व्याख्यान देने के बाद आयोजित संवाद कार्यक्रम में कहीं. उन्होंने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण नीतियों और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के क्रियान्वयन के लिए जनसहयोग और दीर्घकालिक सोच आवश्यक है. उन्होंने कहा कि जाति आधारित राजनीति तभी समाप्त होगी जब समाज स्वयं जातिगत पहचान से ऊपर उठेगा. उन्होंने विभिन्न धर्मों और समुदायों के बीच सौहार्द पर जोर दिया और लोगों से नारेबाजी के बजाय आचरण के माध्यम से सामाजिक जीवन में समानता अपनाने का आग्रह किया.
आरएसएस सरकार नहीं’
जनसंख्या नियंत्रण विधेयक और समान नागरिक संहिता से जुड़े एक सवाल के जवाब में भागवत ने कहा- ‘आरएसएस सरकार नहीं, एक सामाजिक संगठन है. उन्होंने कहा कि कोई भी कानून तभी सफल हो सकता है, जब उसे जनता का सहयोग मिले. उन्होंने कहा, पहले लोगों को शिक्षित करना जरूरी है. नीति आवश्यक है, लेकिन ये सफल तभी होगी जब जनता का सहयोग मिलेगा’.
भागवत ने आपातकाल का किया जिक्र
आपातकाल के दौरान अपनाए गए जनसंख्या नियंत्रण उपायों का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि एक समय ऐसी सरकार थी जिसने आपातकाल के दौरान, विशेष रूप से उत्तर भारत में, जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए आक्रामक प्रयास किए थे. लोगों को जबरन नसबंदी के लिए ले जाया गया था, बाद में वह सरकार पूरी तरह से पराजित हो गई. उन्होंने कहा कि भविष्य की जनसंख्या नीतियों को तैयार करने से पहले जनसांख्यिकीय असंतुलन, महिलाओं की शिक्षा, सशक्तीकरण और स्वास्थ्य जैसे सभी पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए.
लोकतंत्र में सबकुछ धीरे-धीरे होता है
भागवत ने कहा- ‘एक बार नीति तय हो जाने और लोगों को इसके बारे में शिक्षित करने के बाद, यह बिना किसी अपवाद के सभी पर समान रूप से लागू होनी चाहिए. यूसीसी को लेकर उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में पहले से ही ऐसा कानून लागू है और कुछ अन्य राज्यों ने भी इसी तरह के उपाय अपनाए हैं. यह राज्य दर राज्य बढ़ रहा है. शायद, एक दिन यह पूरे भारत में लागू हो जाए, धैर्य रखें. लोकतंत्र में सबकुछ धीरे-धीरे होता है क्योंकि कोई एक व्यक्ति निर्णय नहीं लेता – 142 करोड़ लोग निर्णय लेते हैं’.

