इस्राइल : पश्चिम एशिया में ईरान, इस्राइल और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री जीवनरेखा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को जोखिम में डाल दिया है। ऊर्जा बाजार विश्लेषकों और इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) के आकलन के अनुसार, यदि संघर्ष लंबा खिंचता है या इस समुद्री मार्ग पर बाधा आती है, तो भारत की तेल और गैस आपूर्ति के साथ-साथ निर्यात व्यापार भी प्रभावित हो सकता है। इसी आशंका को देखते हुए भारत सरकार संभावित ऊर्जा और व्यापारिक संकट को लेकर सतर्क हो गई है।
यदि वैश्विक तनाव के कारण कीमतों में लगातार 10 डॉलर तक की बढ़ोतरी होती है तो भारत पर अतिरिक्त 13 से 14 अरब डॉलर का बोझ पड़ सकता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो भारत को उतनी ही मात्रा का तेल खरीदने के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, क्योंकि तेल का व्यापार वैश्विक स्तर पर डॉलर में होता है। इससे भारत का आयात बिल बढ़ जाता है, जबकि निर्यात उतनी तेजी से नहीं बढ़ता। नतीजतन देश से बाहर जाने वाली विदेशी मुद्रा ज्यादा हो जाती है, जिससे चालू खाते का घाटा (करंट अकाउंट डेफिसिट) बढ़ने लगता है।
ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वाली संस्थाओं के मुताबिक यदि ईरान के लगभग 33 लाख बैरल प्रतिदिन के तेल उत्पादन में व्यवधान आता है तो वैश्विक बाजार में तुरंत असर दिख सकता है। विश्लेषकों का अनुमान है कि ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें 9 से 15 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं। यदि संघर्ष और गंभीर हो जाता है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो ब्रेंट क्रूड की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल या उससे अधिक तक पहुंच सकती है।
यह संकट केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रह सकता। डाउन टू अर्थ से बातचीत में केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में नाकेबंदी या लंबी बाधा उत्पन्न होती है तो तेल और गैस के टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 प्रतिशत एलपीजी और करीब 60 प्रतिशत एलएनजी इसी समुद्री मार्ग से आयात करता है। ऐसे में जहाजों के देर से पहुंचने, बीमा प्रीमियम बढ़ने और माल ढुलाई महंगी होने से गैस बाजार पर भी दबाव पड़ सकता है।

