नई दिल्ली : भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने देश की न्याय व्यवस्था को मजबूत करने के लिए एक न्यायिक बुनियादी ढांचा सलाहकार समिति का गठन किया है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अरविंद कुमार इस समिति के अध्यक्ष होंगे। इस पैनल में कलकत्ता, पंजाब और हरियाणा तथा बॉम्बे हाई कोर्ट के न्यायाधीशों को सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। सीपीडब्ल्यूडी (CPWD) के महानिदेशक और सुप्रीम कोर्ट के महासचिव भी इस समिति का हिस्सा होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के हाईकोर्ट में लंबित जमानत याचिकाओं की बढ़ती संख्या पर गहरी चिंता जताई। साथ ही, यह अंबार जल्द खत्म करने के लिए स्वत: सुनवाई व्यवस्था विकसित करने और याचिकाओं के निपटारे की समयसीमा निर्धारित करने जैसे सुझाव भी दिए।
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि जमानत मामलों की सुनवाई में देरी न्याय व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है और इससे आरोपियों के मौलिक अधिकार भी प्रभावित हो रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि उसे पूरा भरोसा है कि हाईकोर्ट, राज्य सरकारें और जांच एजेंसियां जमानत याचिकाओं के समय पर निपटारे की मजबूत व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाएंगी। साथ ही, पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित करेंगी। पीठ ने स्पष्ट किया कि उसके आदेश को हाईकोर्ट के कामकाज में दखल के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। ये सुझाव व्यवस्था की दक्षता को मजबूत करने के मकसद से दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ सनी चौहान बनाम पंजाब राज्य मामले की सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने इस मामले में विभिन्न हाईकोर्ट से लंबित जमानत मामलों का ब्योरा मांगा था। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से ऐसा तंत्र विकसित करने को कहा है जिससे हर जमानत याचिका को निश्चित सुनवाई तिथि मिल सके। अदालत ने सरकारी वकीलों द्वारा अनावश्यक स्थगन मांगने की प्रवृत्ति पर भी नाराजगी जताई।
याचिकाएं दोबारा स्वतः सूचीबद्ध हों…जिन मामलों की सुनवाई नहीं हो सके, उन्हें स्वतः दोबारा सूचीबद्ध किया जाए। जमानत याचिकाओं के निपटारे के लिए समय सीमा तय की जाए। – कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट का इन पहलुओं पर भी जोर
जमानत मामलों की स्वत: सुनवाई की सूची साप्ताहिक या पाक्षिक आधार पर तैयार करने की व्यवस्था पर जोर।
पहली सुनवाई से पूर्व स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने व राज्य या केंद्र सरकार के वकीलों को अग्रिम सूचना दें।
लंबित मामलों की स्थिति चिंताजनक
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कुछ उच्च न्यायालयों में लंबित जमानत याचिकाओं की संख्या अब भी अत्यधिक है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का विशेष रूप से जिक्र करते हुए अदालत ने कहा, वहां लंबित जमानत याचिकाओं की संख्या बहुत अधिक है, जबकि न्यायाधीश प्रतिदिन सैकड़ों मामलों की सुनवाई कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट में जमानत मामलों के महीनों तक लंबित रहने पर भी चिंता जताई।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में पिछले वर्ष 63 हजार से अधिक लंबित जमानत याचिकाओं की स्थिति को भी पीठ ने चिंताजनक बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को शिक्षा या धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले सभी संस्थानों को विनियमित करने के निर्देश देने की मांग के लिए याचिकाकर्ता को केंद्र से संपर्क करने को कहा। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने याचिकाकर्ता, अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय को भारत सरकार के समक्ष एक अभ्यावेदन प्रस्तुत करने की सलाह दी।
पीठ ने कहा, हम इस रिट याचिका का निपटारा करते हुए प्रतिवादी-1 (केंद्र सरकार) को निर्देश देते हैं कि वह याचिकाकर्ता के दिनांक 4 फरवरी, 2026 के अभ्यावेदन पर विचार करे और उचित निर्णय ले। सरकार जो भी फैसला लेती है उससे याचिकाकर्ता को अवगत कराया जाए। सुनवाई के दौरान जब उपाध्याय अपनी दलील पर अड़े रहे, तो पीठ ने कहा, आप एक ऐसी पीठ के सामने हैं जिसमें बेहद रूढ़िवादी और परंपरावादी जज हैं। हम जल्दबाजी नहीं करते। पीठ ने कहा, न्याय एकतरफा नहीं होता। इसमें कार्यपालिका की भी भूमिका होती है।
अधिवक्ता अश्वनी दुबे के जरिये दायर याचिका में अनुच्छेद 21ए, अनुच्छेद 39(एफ), 45 और 51-ए(के) के अनुरूप 14 वर्ष के बच्चों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा या धार्मिक निर्देश देने वाले सभी संस्थानों को पंजीकृत करने, मान्यता देने, पर्यवेक्षण करने और निगरानी के लिए उचित कदम उठाने की मांग की गई। याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत पहले से ही गारंटीकृत अधिकारों के अतिरिक्त कोई विशेष या अतिरिक्त अधिकार प्रदान नहीं करता है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि बच्चे राष्ट्र के विकास का आधार हैं और अपनी कम उम्र के कारण भोले-भाले और अनुभवहीन भी होते हैं। इसलिए, राज्य की उनके प्रति जिम्मेदारी बढ़ जाती है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है क्योंकि छोटे बच्चे, जो राष्ट्र का भविष्य हैं, गैर पंजीकृत संस्थानों में बहकावे में आ सकते हैं। उपाध्याय ने अपनी याचिका में दावा किया कि उन्होंने उत्तर प्रदेश सीमा से लगे कई जिलों का दौरा किया, जहां कई अपंजीकृत और गैर-मान्यता प्राप्त संस्थान संचालित हो रहे थे। उन्होंने कहा कि देश के सीमावर्ती क्षेत्रों में बिना किसी प्रभावी निगरानी या नियामक तंत्र के अपंजीकृत और गैर-मान्यता प्राप्त संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
घर में जातिसूचक टिप्पणी पब्लिक व्यू नहीं, एससी-एसटी केस रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि घर के अंदर हुई कथित जातिसूचक टिप्पणी को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जा सकता, यदि घटना सार्वजनिक नजर में न हुई हो। अदालत ने इसी आधार पर एक आरोपी के खिलाफ दर्ज मामला रद्द कर दिया। उस व्यक्ति पर आरोप था कि उसने घर की चारदीवारी के अंदर अनुसूचित जाति शिकायतकर्ता के साथ जाति-आधारित गाली-गलौज की थी। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा व जस्टिस एन वी अंजरिया की पीठ ने कहा कि एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1)(आर) और 3(1)(एस) लागू होने के लिए यह जरूरी है कि कथित जातिसूचक अपमान किसी ऐसी जगह पर हुआ हो, जहां आम लोगों की नजर या पहुंच हो। अदालत ने माना कि एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध का एक जरूरी तत्व यानी घटना का ’आम लोगों की नजर में आने वाली किसी जगह पर’ होना, इस मामले में पूरी तरह से नदारद था।
मामला एक एफआईआर के मुताबिक, आरोप लगाया गया था कि शिकायतकर्ता के घर के अंदर उसे और उसकी पत्नी को जातिसूचक शब्द कहे गए। ट्रायल कोर्ट ने आरोप तय किए थे और दिल्ली हाईकोर्ट ने भी हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर पर गौर करने के बाद पाया कि घटना निजी घर के भीतर हुई थी और वहां सार्वजनिक लोगों की मौजूदगी का कोई उल्लेख नहीं था। अदालत ने कहा कि केवल निजी स्थान पर हुई घटना को ’पब्लिक व्यू’ नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की अपील स्वीकार करते हुए इस एससी/एसटी अधिनियम के तहत चल रही कार्यवाही रद्द कर दी।
युवा वकीलों के साथ किया जाए संवेदनशील व्यवहार
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की अदालतों में जजों व वकीलों के बीच बेहतर संबंध बनाए रखने पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि खासतौर पर युवा वकीलों के साथ धैर्य, संवेदनशीलता और सम्मान के साथ पेश आना चाहिए ताकि उनमें आत्मविश्वास बढ़े और वे बेहतर तरीके से न्याय व्यवस्था में योगदान दे सकें। सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट से वकीलों और जजों के बीच होने वाले विवादों को समय रहते सुलझाने के लिए शिकायत निवारण समिति बनाने की भी बात कही। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने यह टिप्पणी आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में एक युवा वकील के साथ हुई अभद्रता के मामले की सुनवाई के दौरान की। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था, जिसके बाद देशभर में वकीलों के बीच नाराजगी देखी गई। पीठ ने कहा कि अदालतों में ऐसा माहौल होना चाहिए जहां नए वकील बिना डर के अपनी बात रख सकें। कोर्ट ने यह भी कहा कि बार और बेंच दोनों की जिम्मेदारी है कि वे न्याय व्यवस्था की गरिमा बनाए रखें और युवा वकीलों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट को सुझाव दिया कि वे शिकायत निवारण समितियां बनाएं ताकि वकीलों और जजों के बीच होने वाले विवादों को समय रहते सुलझाया जा सके। कोर्ट ने मीडिया से भी जिम्मेदारीपूर्ण रिपोर्टिंग की अपील की और कहा कि अदालत की कार्यवाही के अधूरे वीडियो क्लिप प्रसारित करने से गलत संदेश जा सकता है। दरअसल आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस टारलाडा राजशेखर राव ।ने एक सुनवाई के दौरान एक युवा वकील को फटकार लगाई थी। बाद में इस घटना की आलोचना बार काउंसिल ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी की थी।
आधारभूत परियोजनाओं को रोकने के लिए पर्यावरण से जुड़े मुकदमों के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि ऐसे मुकदमों से सरकार के सभी प्रोजेक्ट रुक सकते हैं, ऐसे में देश आगे कैसे बढ़ेगा? यह टिप्पणी करते हुए शीर्ष कोर्ट ने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के उस आदेश में दखल देने से इन्कार कर दिया जिसमें गुजरात में एक बंदरगाह विस्तार प्रोजेक्ट के लिए पर्यावरण मंजूरी को सही ठहराया गया था।
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने इस बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई कि आधारभूत परियोजनाओं को रोकने के लिए पर्यावरण से जुड़े मुकदमों का इस्तेमाल किया जा रहा है। पीठ ने यह भी कहा कि एनजीटी ने विशेषज्ञों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए एक विस्तृत और तर्कसंगत आदेश पारित किया है। हमें बताएं कि आपकी ऐसी कौन सी सिफारिशें हैं जिन पर विचार नहीं किया गया है। पीठ ने कहा कि किसी समुद्री जीव का किसी क्षेत्र में अस्थायी रूप से दिखाई देना यह साबित नहीं करता कि वह इलाका उसका स्थायी प्रजनन क्षेत्र है। समुद्री जीव, खासकर व्हेल और अन्य समुद्री स्तनधारी, स्वाभाविक रूप से लंबी दूरी तय करते हैं। केवल उनके किसी इलाके से गुजरने पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह उनके प्रजनन का क्षेत्र है।
सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्मतगणना के नतीजों पर रोक लगाते हुए कर्नाटक के शृंगेरी से कांग्रेस विधायक टीडी राजेगौड़ा को ही विजेता घोषित किया। हाल ही में हुई पुनर्मतगणना के बाद भाजपा उम्मीदवार डीएन जीवराज को विधानसभा सीट से विजेता घोषित किया गया था। जस्टिस संजय कुमार व जस्टिस केवी चंद्रन की पीठ ने यथास्थिति (पुनर्मतगणना से पहले की स्थिति) बहाल करने का निर्देश दिया, साथ ही यह भी कहा कि रिटर्निंग ऑफिसर की ओर से पहले से मान्य डाक मतपत्रों का पुन: सत्यापन करना प्रथम दृष्टया अवैध था। पीठ ने राजेगौड़ा को ही विधायक के रूप में बहाल करने के लिए जरूरी कदम उठाने का निर्देश दिया। यह मामला 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों से संबंधित है, जहां कांग्रेस के राजेगौड़ा को शृंगेरी निर्वाचन क्षेत्र से 201 वोटों के मामूली अंतर से विजेता घोषित किया गया था। बाद में भाजपा उम्मीदवार जीवराज ने कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनाव याचिका के माध्यम से इस परिणाम को चुनौती दी।

