जयपुर: राजस्थान की सियासत और युवाओं के भविष्य से जुड़ी सबसे बड़ी खबर देश की सर्वोच्च अदालत से आई है। राजस्थान सब-इंस्पेक्टर भर्ती-2021 अब इतिहास के पन्नों में एक ‘बुरा सपना’ बनकर ही दर्ज रहेगी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द रखने के फैसले पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है। इस फैसले के आते ही नागौर सांसद और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल ने मोर्चा खोल दिया है और इसे ‘मेहनतकश युवाओं की जीत’ करार दिया है।
‘राजस्थान से हर महीने आ रहे हैं धांधली के 20 केस’
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने चयनित अभ्यर्थियों की अपील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत की टिप्पणियां राजस्थान के सिस्टम के लिए किसी तमाचे से कम नहीं थीं। बेंच ने कहा कि ‘हमारे सामने राजस्थान से हर महीने भर्ती में गड़बड़ी के करीब 20 मामले आ रहे हैं।’ कोर्ट ने साफ कहा कि जब RPSC जैसा संवैधानिक संस्थान ही भ्रष्टाचार के दलदल में फंसा हो और उसका सदस्य जेल में हो, तो ऐसी ‘दूषित’ चयन प्रक्रिया को मंजूरी नहीं दी जा सकती।
फैसला आते ही हनुमान बेनीवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने लिखा कि इस भर्ती में भ्रष्टाचार प्रमाणित होने के बावजूद राजस्थान सरकार इसे बचाने की जुगत में लगी थी। बेनीवाल ने सीधे तौर पर सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘RLP ने इस भर्ती को रद्द करवाने के लिए सड़कों पर बड़ा आंदोलन किया था। आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने साबित कर दिया कि सरकार का चेहरा दोगला है।’ बेनीवाल का इशारा साफ था कि मलाई खाने वाले अंदर थे और पसीना बहाने वाला युवा सड़कों पर।
NEET का उदाहरण और ‘सेपरेशन’ का पेंच
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान NEET का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी 44 संदिग्धों के कारण कड़े कदम उठाने पड़े थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनन दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों को अलग करना जरूरी है, लेकिन इस केस में ‘सिस्टमैटिक लीक’ इतना गहरा है कि निर्दोषों को बचाना मुमकिन नहीं है। यह टिप्पणी उन अभ्यर्थियों के लिए आखिरी उम्मीद के टूटने जैसा है जो बिना किसी धांधली के चयनित हुए थे।
आंदोलन से अदालत तक की लड़ाई
राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने 28 अगस्त 2025 को इस भर्ती को रद्द किया था, जिसे खंडपीठ ने 4 अप्रैल 2026 को बरकरार रखा। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी उसी पर मुहर लगा दी है। यह फैसला केवल एक भर्ती का रद्द होना नहीं है, बल्कि हनुमान बेनीवाल जैसे नेताओं के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार भी बन गया है, जो लगातार पेपर लीक को लेकर ‘सिस्टम’ के खिलाफ ताल ठोक रहे हैं। इस फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हों, तो पूरी फसल को ही काटना पड़ता है।

